मुद्दे के बारे में

बंदूक और गरीबी के बीच में कौन सी कडी है ?

हर साल सशस्त्र हिंसा – अपराध और संघर्ष दोनों से मरने वाले ५००,००० से अधिक लोगमें से ज्यादातर विकासशील देशों में रहते है ।
सहस्त्राब्दी विकास लक्ष्य को प्राप्त करने में असमर्थ ३४ देशों की सूचि में से २२ देश या तो संघर्षरत है या तो अभी संघर्ष से उभरे हैं ।

कर्ज

शस्त्रों की आयात के लिए जरूरी है विदेशी धन । ऐसे देश जिनके पास इसके मर्यादित स्रोत है उन्हें ऋण की जरूरत पडती है जो कि आखिरकार कर्ज को बढावा देती है । भूतकाल में शस्त्रों की आयात विकासशील देशों में कर्ज का बढावा करने में प्रमुख कारण था । इसमें एक भाग गैरजिम्मेवाराना शस्त्रों की आयात का भी है । १९९४ में लगाये गये अंदाज के मुताबिक दुनिया के सभी विकासशील देशों के कुल कर्ज का पांचवां हिस्सा सिर्फ शस्त्रों की खरीदी में जाता है ।

AK 47 राइफल के एक राउन्ड का औंसत मूल्य बीस पैसा है । दुनिया के कुछ हिस्सों में तो ये राइफल भी १० डोलर से भी कम कीमत में उपलब्ध है । लेकिन सुलभता से प्राप्त ईन हथियारों से होते नुकसान की लागत अरबों रूपयों की होती है जो की अनगिनत समुदायों के उज्जवल भविष्य के अरमान को निराश करती है । सहस्त्राब्दी विकास लक्ष्य (मिलेनियम डिवलपमेन्ट गोल) को प्राप्त करने की क्षमता नहीं रखने वाले देशों की सूचि में समाविष्ट ३४ देशों में से २२ देश ऐसे हैं जो कि अभी अभी शस्त्र संघर्ष से उभरे है । शस्त्र सिर्फ रणभूमि में ही विनाश नहीं करतें हैं ।

हर साल ५ लाख से भी ज्यादा लोग शस्त्र हिंसा से मरते हैं और अनगिनत लोग हर रोज इससे घायल होते हैं । सशस्त्र हिंसा भय और असलामती पैदा करती हैं, परिवारों को नष्ट करती हैं, स्वास्थ्य सुविधाओं का बोझ बढाती हैं, निवेश को हतोत्साह करती है और समुदायों को, देशों को और कभी कभी पूरे क्षेत्र को बरबाद कर देती हैं । हथियार या हथियारों की दौड पर जो खर्च होता है वो शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी सार्वजनिक सेवाओं पर होने वाले खर्च से मोडे हुए पैसे होते हैं । पारदर्शिता के बगैर किया गया ऐसा खर्च भ्रष्टाचार को बढावा देता है जो ज्यादा पैसा खा जाता है और जनता के भरोसे को निगल जाता है ।

केवल हथियारों का उपयोग ही नहीं पर उसके उपयोग का डर भी विकास की संभावनाओं को पीछे धकेल देता है । जो समाज अवैद्य हथियारों, असलामती की भावना और हिंसा के डर से घिरा हुआ हो वो विकास की गतिविधियों में सक्रिय रूप से भाग लेने और खुलके बोलने से परहेज करता है ।

२०१० तक दुनिया के गरीबों की आधी आबादी उस मुकाम पर पहूंच जाएगी जहां पर हिंसक संघर्ष होगा या फिर उसका जोखिम मंडरायेगा । गरीबी और असमानता सशस्त्र हिंसा, और असुरक्षा को पैदा करते है । जब कि हिंसा गरीबी निर्मूलन के प्रयास को पीछे धकेल देती है ।

दुनिया के लाखों लोग सशस्त्र हिंसा के विकास पर होते प्रभाव को हर रोज महसूस करते है । पूर्वीय कोंगो की महिलाएं असुरक्षा के कारण पर्याप्त स्वास्थ्य सेवा का लाभ नहीं ले पाती हैं । दूसरी ओर भारत के शिक्षकों को शिक्षा के लिए जरूरी सामग्री नहीं मिलती है क्योंकि सरकार हथियारों को आयात पर ज्यादा पैसे खर्च कर देती है ।

ट्रान्सपरन्सी इन्टरनेशनल के हिसाब से दुनिया के सबसे भ्रष्ट तीन व्यवसायों में से एक है आंतरराष्ट्रीय शस्त्र व्यवसाय । इसके परिणाम सिर्फ यह नहीं है कि सरकारी पैसे बिगडते है पर प्राथमिक जरूरियातों की आपूर्ति के विपरित ये सारे पैसे शस्त्रों की खरीदी में चले जाते है जहां पर भ्रष्ट अधिकारियों को सबसे ज्यादा फायदा मिलता है । दोनों ही सुरत में सरकारी पैसे विकास के काम के लिए कम पाये जाते है ।

तसवीर : दक्षिण आफ्रिका
लाखों रूपये जो शस्त्रों के भ्रष्टाचार में खर्च होते है उसे पानी, शिक्षा या गरीब समुदायों के आरोग्य पर खर्च किया जा सकता था । स्कूल पश्चात् के क्लब पर उपलब्ध ये नल बच्चों को पानी देता है । इसका खर्च आंतरराष्ट्रीय सहायता से मिलता है जबकि देश भ्रष्ट शस्त्रों की सौदेबाजी में लाखों रूपये कर्ज उठाता है ।